• बहादुर - कहानी हिंदी - रचनाकार: अमरकांत

  • सहसा मैं काफी गम्भीर था, जैसा कि उस व्यक्ति को हो जाना चाहिए, जिस पर एक भारी दायित्व आ गया हो. वह सामने खड़ा था और आंखों को बुरी तरह मटका रहा था. बारह-तेरह वर्ष की उम्र. ठिगना शरीर, गोरा रंग और चपटा मुंह. वह सफेद नेकर, आधी बांह की ही सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने था. उसके गले में स्काउटों की तरह एक रूमाल बंधा था. उसको घेरकर परिवार के अन्य लोग खड़े थे. निर्मला चमकती दृष्टि से कभी लड़के को देखती और कभी मुझको और अपने भाई को. निश्चय ही वह पंच बराबर हो गयी थी.

    उसको लेकर मेरे साले साहब आये थे. नौकर रखना कई कारणों से बहुत ज़रूरी हो गया था. मेरे सभी भाई और रिश्तेदार अच्छे ओहदों पर थे और उन सभी के यहां नौकर थे. मैं जब बहन की शादी में घर गया तो वहां नौकरों का सुख देखा. मेरी दोनों भाभियां रानी की तरह बैठकर चारपाइयां तोड़ती थीं, जबकि निर्मला को सबेरे से लेकर रात तक खटना पड़ता था. मैं ईर्ष्या से जल गया. इसके बाद नौकरी पर वापस आया तो निर्मला दोनों जून ‘नौकर-चाकर’ की माला जपने लगी. उसकी तरह अभागिन और दुखिया त्री और भी कोई इस दुनिया में होगी? वे लोग दूसरे होते हैं, जिनके भाग्य में नौकर का सुख होता है…

    पहले साले साहब से असाधारण विस्तार से उसका किस्सा सुनना पड़ा. वह एक नेपाली था, जिसका गांव नेपाल और बिहार की सीमा पर था. उसका बाप युद्ध में मारा गया था और उसकी मां सारे परिवार का भरण-पोषण करती थी. मां उसकी बड़ी गुस्सैल थी और उसको बहुत मारती थी. मां चाहती थी कि लड़का घर के काम-धाम में हाथ बटाये, जब कि वह पहाड़ या जंगलों में निकल जाता और पेड़ों पर चढ़कर चिड़ियों के घोंसलों में हाथ डालकर उनके बच्चे पकड़ता या फल तोड़-तोड़कर खाता. कभी-कभी वह पशुओं को चराने के लिए ले जाता था. उसने एक बार उस भैंस को बहुत मारा, जिसको उसकी मां बहुत प्यार करती थी, और इसीलिए उससे वह बहुत चिढ़ता था. मार खाकर भैंस भागी-भागी उसकी मां के पास चली गयी, जो कुछ दूरी पर एक खेत में काम कर रही थी. मां का माथा ठनका. बेचारा बेजबान जानवर चरना छोड़कर यहां क्यों आयेगा? ज़रूर लौंडे ने उसको काफी मारा है. वह गुस्से-से पागल हो गयी. जब लड़का आया तो मां ने भैंस की मार का काल्पनिक अनुमान करके एक डंडे से उसकी दुगुनी पिटाई की और उसको वहीं कराहता हुआ छोड़कर घर लौट आयी. लड़के का मन मां से फट गया और वह रात भर जंगल में छिपा रहा. जब सबेरा होने को आया तो वह घर पहुंचा और किसी तरह अंदर चोरी-चुपके घुस गया. फिर उसने घी की हंडिया में हाथ डाल कर मां के रखे रुपयों में से दो रुपये निकाल लिये. अंत में नौ-दो ग्यारह हो गया. वहां से छह मील की दूरी पर बस स्टेशन था, जहां गोरखपुर जाने वाली बस मिलती थी.

    ‘तुम्हारा नाम क्या है, जी?’ मैंने पूछा.

    ‘दिल बहादुर, साहब.’

    उसके स्वर में एक मीठी झनझनाहट थी. मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने उसको क्या हिदायतें दी थीं. शायद यह कि शरारतें छोड़कर ढंग से काम करे और उस घर को अपना घर समझे. इस घर में नौकर-चाकर को बहुत प्यार और इगगज्ज़त से रखा जाता है. अगर वह वहां रह गया तो ढंग-शऊर सीख जायेगा, घर के और लड़कों की तरह पढ़-लिख जाएगा और उसकी ज़िंदगी सुधर जाएगी. निर्मला ने उसी समय कुछ व्यावहारिक उपदेश दे डाले थे. इस मुहल्ले में बहुत तुच्छ लोग रहते हैं, वह न किसी के यहां जाए और न किसी का काम करे. कोई बाज़ार से कुछ लाने को कहे तो वह ‘अभी आता हूं’, कहकर अंदर खिसक जाए. उसको घर के सभी लोगों से सम्मान और तमीज से बोलना चाहिए. और भी बहुत-सी बातें. अंत में निर्मला ने बहुत ही उदारतापूर्वक लड़के के नाम में से ‘दिल’ शब्द उड़ा दिया.

    परंतु बहादुर बहुत ही हंसमुख और मेहनती निकला. उसकी वजह से कुछ दिनों तक हमारे घर में वैसा ही उत्साहपूर्ण वातावरण छाया रहा, जैसा कि प्रथम बार तोता-मैना या पिल्ला पालने पर होता है. सबेरे-सबेरे ही मुहल्ले के छोटे-छोटे लड़के घर के अंदर आकर खड़े हो जाते और उसको देखकर हंसते या तरह-तरह के प्रश्न करते. ‘ऐ, तुम लोग छिपकली को क्या कहते हो?’ ‘ऐ, तुमने शेर देखा है?’ ऐसी ही बातें. उससे पहाड़ी गाने की फरामाइशें की जातीं. घर के लोग भी उससे इसी प्रकार की छेड़खानियां करते थे. वह जितना उत्तर देता था उससे अधिक हंसता था. सबको उसके खाने और नाश्ते की बड़ी फिक्र रहती.

    निर्मला आंगन में खड़ी होकर पड़ोसियों को सुनाते हुए कहती थी- ‘बहादुर आकर नाश्ता क्यों नहीं कर लेते? मैं दूसरी औरतों की तरह नहीं हूं, जो नौकर-चाकर को तलती-भूनती हैं. मैं तो नौकर-चाकर को अपने बच्चे की तरह रखती हूं. उन्होंने तो साफ-साफ कह दिया है कि सौ-डेढ़ सौ महीनाबारी उस पर भले ही खर्च हो जाय, पर तकलीफ, उसको ज़रा भी नहीं होनी चाहिए. एक नेकर-कमीज तो उसी रोज लाये थे… और भी कपड़े बन रहे हैं…’

    धीरे-धीरे वह घर के सारे काम करने लगा. सबेरे ही उठकर वह बाहर नीम के पेड़ से दातून तोड़ लाता था. वह हाथ का सहारा लिये बिना कुछ दूर तक तने पर दौड़ते हुए चढ़ जाता. मिनट भर में वह पेड़ की पुलई पर नजर आता. निर्मला छाती पीटकर कहती थी- अरे रीछ-बंदर की जात, कहीं गिर गया तो बड़ा बुरा होगा. वह घर की सफाई करता, कमरों में पोंछा लगाता, अंगीठी जलाता, चाय बनाता और पिलाता. दोपहर में कपड़े धोता और बर्तन मलता. वह रसोई बनाने की भी ज़िद्द करता, पर निर्मला स्वयं सब्जी और रोटी बनाती. निर्मला की उसको बहुत फिक्र रहती थी. उसकी उन दिनों तबीयत ठीक नहीं रहती थी, इसलिए वह कुछ दवा ले रही थी. बहादुर उसको कोई काम करते देखकर कहता था- ‘माता जी, मेहनत न करो, तकलीफ बड़ जायेगा.’ वह कोई भी काम करता होता, समय होने पर हाथ धोकर भालू की तरह दौड़ता हुआ कमरे में जाता और दवाई का डिब्बा निर्मला के सामने-लाकर रख देता.

    जब मैं शाम को दफ्तर से आता तो घर के सभी लोग मेरे पास आकर दिन भर के अपने अनुभव सुनाते थे. बाद में वह भी आता था. वह एक बार मेरी ओर देखकर सिर झुका लेता और धीरे-धीरे मुस्कराने लगता. वह कोई बहुत ही मामूली घटना की रिपोर्ट देता – ‘बाबू जी, बहिन जी का एक सहेली आया था.’ या ‘बाबू जी, भैया सिनेमा गया था.’ इसके बाद वह इस तरह हंसने लगता था, गोया बहुत ही मजेदार बात कह दी हो. उसकी हंसी बड़ी कोमल और मीठी थी, जैसे फूल की पंखुड़ियां बिखर गयी हों. मैं उससे बातचीत करना चाहता था, पर ऐसी इच्छा रहते हुए भी मैं जान-बूझकर बहुत गम्भीर हो जाता था और दूसरी ओर देखने लगता था.

    निर्मला कभी-कभी उससे पूछती थी- बहादुर, तुमको अपनी मां की याद आती है?

    ‘नहीं.’

    ‘क्यों?’

    ‘वह मारता क्यों था?’ इतना कहकर वह खूब हंसता था, जैसे मार खाना खुशी की बात हो.

    ‘तब तुम अपना पैसा मां के पास कैसे भेजने को कहते हो?’

    ‘मां-बाप का कर्जा तो जन्म भर भरा जाता है’ वह और भी हंसता था.

    निर्मला ने उसको एक फटी-पुरानी दरी दे दी थी. घर से वह एक चादर भी ले आया था. रात को काम-धाम करने के बाद वह भीतर के बरामदे में एक टूटी हुई बंसखट पर अपना बिस्तर बिछाता था. वह बिस्तरे पर बैठ जाता और अपनी जेब में से कपड़े की एक गोल-सी नेपाली टोपी निकालकर पहन लेता, जो बायीं ओर काफी झुकी रहती थी. फिर वह एक छोटा-सा आइना निकालकर बंदर की तरह उसमें अपना मुंह देखता था. वह बहुत ही प्रसन्न नज़र आता था. इसके बाद कुछ और भी चीज़ें उसकी जेब से निकलकर उसके बिस्तरे पर सज जाती थीं- कुछ गोलियां, पुराने ताश की एक गड्डी, कुछ खूबसूरत पत्थर के टुकड़े, ब्लेड, कागज़ की नावें. वह कुछ देर तक उनसे खेलता था. उसके बाद वह धीमे-धीमे स्वर में गुनगुनाने लगता था. उन पहाड़ी गानों का अर्थ हम समझ नहीं पाते थे, पर उनकी मीठी उदासी सारे घर में फैल जाती, जैसे कोई पहाड़ की निर्जनता में अपने किसी बिछुड़े हुए साथी को बुला रहा हो.

    दिन मज़े में बीतने लगे. बरसात आ गयी थी. पानी रुकता था और बरसता था. मैं अपने को बहुत ऊंचा महसूस करने लगा था. अपने परिवार और सम्बंधियों के बड़प्पन तथा शान-बान पर मुझे सदा गर्व रहा है. अब मैं मुहल्ले के लोगों को पहले से भी तुच्छ समझने लगा. मैं किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता. किसी की ओर ठीक से देखता भी नहीं था. दूसरे के बच्चों को मामूली-सी शरारत पर डांट-डपट देता. कई बार पड़ोसियों को सुना चुका था- जिसके पास कलेजा है, वही आजकल नौकर रख सकता है. घर के सवांग की तरह रहता है. निर्मला भी सारे मुहल्ले में शुभ सूचना दे आयी थी- आधी तनखाह तो नौकर पर ही खर्च हो रही है, पर रुपया-पैसा कमाया किसलिए जाता है? ये तो कई बार कह ही चुके थे कि तुम्हारे लिए दुनिया के किसी कोने से नौकर ज़रूर लाऊंगा… वही हुआ.

    निस्संदेह बहादुर की वजह से सबको खूब आराम मिल रहा था. घर खूब साफ और चिकना रहता. कपड़े चमाचम सफेद. निर्मला की तबीयत भी काफी सुधर गयी. अब कोई एक खर भी न टकसाता था. किसी को मामूली-से-मामूली काम करना होता तो वह बहादुर को आवाज़ देता. ‘बहादुर, एक गिलास पानी.’ ‘बहादुर पेन्सिल नीचे गिरी है, उठाना.’ इसी तरह की फरमाइशें! बहादुर घर में फिरकी की तरह नाचता रहता. सभी रात में पहले ही सो जाते थे और सबेरे आठ बजे के पहले न उठते थे.

    मेरा बड़ा लड़का किशोर काफी शान-शौकत और रोब-दाब से रहने का कायल था और उसने बहादुर को अपने कड़े अनुशासन में रखने की आवश्यकता महसूस कर ली थी. फलतः उसने अपने सभी काम बहादुर को सौंप दिये. सबेरे उसके जूते में पालिश लगनी चाहिए. कालेज जाने के ठीक पहले साइकिल की सफाई ज़रूरी थी. रोज ही उसके कपड़ों की धुलायी और इत्री होनी चाहिए. और रात में सोते समय वह नित्य बहादुर से अपने शरीर की मालिश कराता और मुक्की भी लगवाता. पर इतनी सारी फरमाइशों की पूर्ति में कभी-कभी कोई गड़बड़ी भी हो जाती. जब ऐसा होता, किशोर गर्जन-तर्जन करने लगता, उसको बुरी-बुरी गालियां देता और उस पर हाथ छोड़ देता. मार खाकर बहादुर एक कोने में खड़ा हो जाता- चुपचाप.

    ‘देख बे’, किशोर चेतावनी देता- ‘मेरा काम सबसे पहले होना चाहिए. अगर एक काम भी छूटा तो मारते-मारते हुलिया टाइट कर दूंगा. साला, कामचोर, करता क्या है तू? बैठा-बैठा खाता है.’

    रोज ही कोई-कोई ऐसी बात होने लगी, जिसकी रिपोर्ट पत्नी मुझे देती थी. मैंने किशोर को मना किया, पर वह नहीं माना तो मैंने यह सोचकर छोड़ दिया कि थोड़ा-बहुत तो यह चलता ही रहता है. फिर एक हाथ से ताली कहां बजती है? बहादुर भी बदमाशी करता होगा. पर एक दिन जब मैं दफ्तर से आया तो मैंने किशोर को एक डंडे से बहादुर की पिटाई करते हुए देखा. निर्मला कुछ दूरी पर खड़ी होकर ‘हां-हां’ कहती हुई मना कर
    रही थी.

    मैंने किशोर को डांट कर अलग किया. कारण यह था कि शाम को साइकिल की सफाई करना बहादुर भूल गया था. किशोर ने उसको मारा तथा गालियां दीं तो उसने उसका काम करने से ही इन्कार कर दिया.

    ‘तुम साइकिल साफ क्यों नहीं करते?’ मैंने उससे कड़ाई से पूछा.

    ‘बाबूजी, भैया ने मेरे बाप को क्यों लाकर खड़ा किया?’ वह रोते हुए बोला.

    मैं जानता था कि किशोर उसको और भी भद्दी गालियां देता था, लेकिन आज उसने ‘सूअर का बच्चा’ कहा था, जो उसे बरदाश्त न हुआ. निस्संदेह वह गाली उसके बाप पर पड़ती थी. मुझे कुछ हंसी आ गयी. खैर, किशोर के व्यवहार को अच्छा नहीं कहा जा सकता, पर गृहस्वामी होने के कारण मुझ पर कुछ और गम्भीर दायित्व भी थे.

    मैंने उसे समझाया- ‘बहादुर, ये आदतें ठीक नहीं. तुम ठीक से काम करोगे तो तुमको कोई कुछ भी नहीं कहेगा. मेहनत बहुत अच्छी चीज़ है, जो उससे बचने की कोशिश करता है, वह कुछ भी नहीं कर सकता. रूठना-फूलना मुझे सख्त नापसंद है. तुम तो घर के लड़के की तरह हो. घर के लड़के मार नहीं खाते? हम तुमको जिस सुख-आराम से रखते हैं, वह कोई क्या रखेगा? जाकर दूसरे घरों में देखो तो पता लगे. नौकर-चाकर भर पेट भोजन के लिए तरसते रहते हैं. चलो, सब खत्म हुआ, अब काम-
    धाम करो…’

    वह चुपचाप सुनता रहा. फिर हाथ-मुंह धोकर काम करने लगा. जल्दी वह प्रसन्न भी हो गया. रात में सोते समय वह अपनी टोपी पहन कर देर तक गाता रहा.

    लेकिन कुछ दिनों बाद एक और भी गड़बड़ी शुरू हुई. निर्मला बहुत पतली-पतली रोटियां सेंकती थी, इसलिए वह रोटी बनाने का काम कभी बहादुर से नहीं लेती थी, लेकिन मुहल्ले की किसी औरत ने उसे यह सिखा दिया कि परिवार के लिए रोटियां बनाने के बाद वह बहादुर से कहे कि वह अपनी रोटी खुद बना लिया करे, नहीं तो नौकर-चाकर की आदत खराब हो जाती है, महीन खाने से उनकी आदत बिगड़ जाती है.

    यह बात निर्मला को जंच गयी थी और रात में उसने ऐसा ही प्रयोग किया. वह अपनी रोटियां बनाकर चौके में से उठ गयी. बहादुर का मुंह उतर गया. वह चूल्हे के पास सिर झुकाकर चुपचाप खड़ा रहा.

    ‘क्या हो गया, रे?’ निर्मला ने पूछा.

    वह कुछ नहीं बोला.

    ‘चल, चुपचाप बना अपनी रोटियां. तू सोचता है कि मैं तुझे पतली-पतली, नरम-नरम रोटियां सेंककर खिलाऊंगी? तू कोई घर का लड़का है? नौकर-चाकर तो अपना बनाकर खाते ही रहते हैं. तीता तो इनको इसलिए लग रहा है कि सारे घर के लिए मैंने रोटियां बनायीं, इनको अलग करके इनके साथ भेद क्यों किया? वाह रे, इसके पेट में तो लम्बी दाढ़ी है! समझ जा, रोटियां नहीं सेंकेगा तो भूखा रहेगा.’

    पर बहादुर उसी तरह खड़ा रहा तो निर्मला का गुस्से से बुरा हाल हो गया. उसने लपककर उसके गाल पर दो-तीन थप्पड़ जड़ दिये- ‘सूअर कहीं के! इसीलिए तुझे किशोर मारता है. इसी वजह से तेरी मां भी मारती होगी. चल, बना रोटी…’

    ‘मैं नहीं बनाऊंगा… मेरी मां भी सारे घर की रोटियां बनाकर मुझसे रोटी सेंकवाती थी.’ वह रोने लगा था.

    ‘तो क्या मैं तेरी मां हूं कि तू मुझसे जिद्द कर रहा है? घर के लड़कों के बराबर बन रहा है? मारते-मारते मुहं रंग दूंगी.’

    पर उसने अपने लिए रोटी नहीं बनायी. मुझे भी बड़ा गुस्सा आया. मैंने उसको डांटा और समझाया. पर वह नहीं माना. रात भर वह भूखा ही रहा.

    पर सबेरे उठकर वह पहले की तरह ही हंसने लगा. उसने अंगीठी जला कर अपने लिए रोटियां सेंकी. अपनी बनायी मोटी और भद्दी रोटियों को देखकर वह खिलखिलाने लगा. फिर रात की बची हुई सब्जी से उसने खाना खा लिया.

    लेकिन निर्मला का भी हाथ खुल गया था. वह उससे कुछ चिढ़ भी गयी थी. अब बहादुर से कोई भी गलती होती तो वह उस पर हाथ चला देती. उसको मारने वाले अब घर में दो व्यक्ति हो गये थे और कभी-कभी एक गलती के लिए उसको दोनों मारते.

    बरसात बीत गयी थी. आकाश दर्पण की तरह स्वच्छ दिखाई देता. मैंने बहादुर की मां के पास चिट्ठी लिखी थी कि उसका लड़का मेरे पास मजे में है और मैं उसकी तनख्वाह के पैसे उसके पास भेज दिया करूंगा, लेकिन कई महीने के बाद भी उधर से कोई जवाब नहीं आया था. मैंने बहादुर से कह दिया था कि उसका पैसा यहां जमा रहेगा, जब वह घर जायेगा तो लेता जायेगा.

    पर अब बहादुर से भूल-गलतियां अधिक होने लगी थीं. शायद इसका कारण मारपीट और गाली-गलौज हो. मैं कभी-कभी इसको रोकना चाहता, फिर यह सोचकर चुप लगा जाता कि नौकर-चाकर तो मार-पीट खाते ही
    रहते हैं.

    एक दिन रविवार को मेरी पत्नी के एक रिश्तेदार आये. वह बीवी-बच्चों के साथ थे. वह अपने किसी खास सम्बंधी के यहां आये थे तो यहां भी भेंट-मुलाकात करने के लिए चले आये थे. घर में बड़ी चहल-पहल मच गयी. मैं बाज़ार से रोहू मछली और देहारादूनी चावल ले आया. नाश्ता-पानी के बाद बातों की जलेबी छनने लगी. पर इसी समय एक घटना हो गयी.

    अचानक उस रिश्तेदार की पत्नी नीचे फर्श पर झुककर देखने लगी. फिर उन्होंने चारपाई के अंदर झांककर देखा. अंत में कमरे के अंदर गयीं और फर्श पर पड़े हुए कागज़ों को उठाकर जांच-पड़ताल
    करने लगीं.

    ‘क्या बात है?’ मैंने पूछा.

    रिश्तेदार की पत्नी जबरदस्ती मुस्कराकर मजबूरी में सिर हिलाते हुए बोली- ‘क्या बतायें… ग्यारह रुपये साड़ी के खूंट से निकालकर यहीं चारपाई पर रखे… पर वे मिल नहीं रहे हैं…’

    ‘आपको ठीक याद है न…’

    ‘हां-हां- खूब अच्छी तरह याद है. ये रुपये मैंने खूंट में बांधकर रखे थे… रिक्शेवाले को देने के लिए खूंट खोला ही था, फिर वे रुपये चारपाई पर रख दिये थे कि चार रुपये की मिठाई मंगा लूंगी और कुछ बच्चों के हाथ पर रख दूंगी. रास्ते में कोई ढंग की दुकान नहीं मिली थी, नहीं तो उधर से ही लाती. किसी के यहां खाली-हाथ जाने में अच्छा भी नहीं लगता. बताइए, अब तो मैं कहीं की न रही- फिर मेरी ओर झुककर धीमे स्वर में कहा था- ज़रा उससे पूछिए न! वह इधर आया था. कुछ देर तक वह यहां खड़ा रहा, फिर तेज़ी से बाहर चला गया था.

    ‘अरे- नहीं, वो ऐसा नहीं है’, मैंने कहा.

    ‘यू डू नाट नो-दीज पीपुल आर एक्सपर्ट इन दिस आर्ट’ रिश्तेदार ने कहा. मैंने बहादुर की ओर तिरछी दृष्टि से देखा. वह सिर झुका कर आटा गूंथ रहा था. उसके चेहरे पर संतुष्टि एवं प्रफुल्लता थी. उसने ऐसा काम तो कभी नहीं किया, बल्कि जब कभी उसने दो-चार आने इधर-उधर पड़े देखे तो उठाकर निर्मला के हाथ में दे दिये थे. पर किसी के दिल की बात कोई कैसे जान सकता है? न मालूम अचानक मुझे क्या हो गया और मैं गुस्से में आ गया.

    ‘बहादुर!’ -मैंने कड़े स्वर में कहा.

    ‘जी, बाबू जी.’

    ‘इधर आओ.’

    वह आकर खड़ा हो गया.

    ‘तुमने यहां से रुपये उठाये थे?’

    ‘जी नहीं, बाबूजी’, उसने निर्भय
    उत्तर दिया.

    ‘ठीक बताओ… मैं बुरा नहीं मानूंगा.’

    ‘नहीं बाबूजी. मैं लेता तो बता देता.’

    ‘तुम यहां खड़े नहीं थे?’ -रिश्तेदार की पत्नी ने कहा ‘फिर तेज़ी से बाहर चले गये थे. देखो भैया, सच-सच बता दो. मिठाई खरीदने और बच्चों को देने के लिए ये रुपये रखे थे. मैं तो बुरी फंसी. अब वापस जाने के लिए रिक्शे के भी पैसे नहीं.’

    ‘मैं तो बाहर नमक लेने गया था.’

    ‘सच-सच बता बहादुर! अगर नहीं बतायेगा तो बहुत पीटूंगा और पुलिस के सुपुर्द कर दूंगा.’ मैं चिल्ला पड़ा.

    ‘मैंने नहीं लिया, बाबूजी.’ -बहादुर का मुंह काला पड़ गया था.

    पता नहीं मुझे क्या हो गया. मैंने सहसा उछलकर उसके गाल पर एक तमाचा जड़ दिया. मैं आशा कर रहा था कि ऐसा करने से वह बता देगा. तमाचा खाकर वह गिरते-गिरते बचा. उसकी आंखों से आंसू
    गिरने लगा.

    ‘मैंने नहीं लिया…’

    इसी समय रिश्तेदार साहब ने एक अजीब हरकत की- ‘अच्छा छोड़िए, इसको पुलिस के पास ले जाता हूं.’ इतना कहकर उन्होंने बहादुर का हाथ पकड़ लिया और उसको दरवाजे की ओर घसीटकर ले गये. पर दरवाजे के पास उससे धीरे-से बोले- ‘देखो, तुम मुझे बता दो… मैं कुछ नहीं करूंगा, बल्कि तुमको इनाम में दो रुपये दे दूंगा.’

    पर बहादुर ने इनकार कर दिया. इसके बाद रिश्तेदार साहब दो-तीन बार उसको दरवाजे की ओर खींचकर ले गये, जैसे पुलिस को देने ही जा रहे हैं. लेकिन आगे बढ़कर वह रुक जाते और उससे धीमे-धीमे शब्दों में पूछ-ताछ करने लगते.

    अंत में हारकर उन्होंने उसको छोड़ दिया और वापस आकर चारपाई पर बैठते हुए हंसकर बोले- ‘जाने दीजिए… ये सब बड़े घाघ होते हैं. किसी झाड़ी-वाड़ी में छिपा आया होगा या ज़मीन में गाड़ आया होगा. मैं तो इन सबों को खूब जानता हूं. भालू-बंदर से कम थोड़े होते हैं ये. चलिए, इतना नुकसान लिखा था.’

    इसके बाद निर्मला ने भी उसको डराया-धमकाया और दो-चार तमाचे जड़ दिये, पर वह ‘नहीं-नहीं’ करता रहा.

    इस घटना के बाद बहादुर काफी डांट-मार खाने लगा. घर के सभी लोग उसको कुत्ते की तरह दुरदुराया करते. किशोर तो जैसे उसकी जान के पीछे पड़ गया था. वह उदास रहने लगा और काम में लापरवाही करने लगा.

    एक दिन मैं दफ्तर से विलम्ब से आया. निर्मला आंगन में चुपचाप सिर पर हाथ रखकर बैठी थी. अन्य लड़कों का पता नहीं था, लेकिन लड़की अपनी मां के पास खड़ी थी. अंगीठी अभी नहीं जली थी. आंगन गंदा पड़ा था. बर्तन बिना मले हुए रखे थे. सारा घर जैसे काट रहा था.

    ‘क्या बात है?’ मैंने पूछा.

    ‘बहादुर भाग गया.’

    ‘भाग गया. क्यों?’

    ‘पता नहीं. आज तो कुछ हुआ भी नहीं था. सबेरे से ही बड़ा प्रसन्न था. हमेशा माताजी माताजी, किये रहा. दोपहर में खाना खाया. उसके बाद आंगन से सिल-बट्टा लेकर बरामदे में रखने जा रहा था कि सिल हाथ से छूटकर गिर गयी और दो टुकड़े हो गयी. शायद इसी डर से वह भाग गया कि लोग मारेंगे. पर मैं इसके लिए उसको थोड़े कुछ कहती? क्या बताऊं, मेरी किस्मत में आराम ही नहीं…’

    ‘कुछ ले गया?’

    ‘यही तो अफसोस है. कोई भी सामान नहीं ले गया है. उसके कपड़े, उसका बिस्तर, उसके जूते- सभी छोड़ गया है. पता नहीं उसने हमें क्या समझा? अगर वह कहता तो मैं उसे रोकती थोड़े? बल्कि उसको खूब अच्छी तरह पहना-ओढ़ाकर भेजती, हाथ में उसकी तनख्वाह के रुपये रख देती. दो-चार रुपये और अधिक दे देती. पर वह तो कुछ ले ही नहीं गया…’

    ‘और वे ग्यारह रुपये?’

    ‘अरे वह सब झूठ है. मैं तो पहले ही जानती थी कि वे लोग बच्चों को कुछ देना नहीं चाहते, इसलिए अपनी गलती और लाज छिपाने के लिए यह प्रपंच रच रहे हैं. उन लोगों को क्या मैं जानती नहीं? कभी उनके रुपये रास्ते में गुम हो जाते हैं… कभी वे गलती से घर ही छोड़ आते हैं. मेरे कलेजे में तो जैसे कुछ हौड़ रहा है. किशोर को भी बड़ा अफसोस है. उसने सारा शहर छान मारा, पर बहादुर नहीं मिला. किशोर आकर कहने लगा- ‘अम्मां, एक बार भी अगर बहादुर आ जाता तो मैं उसको पकड़ लेता और कभी जाने न देता. उससे माफी मांग लेता और कभी नहीं मारता. सच, अब ऐसा नौकर कभी नहीं मिलेगा. कितना आराम दे गया है वह. अगर वह कुछ चुराकर ले गया होता तो संतोष हो जाता…’

    निर्मला आंखों पर आंचल रखकर रोने लगी. मुझे बड़ा क्रोध आया. मैं चिल्लाना चाहता था पर भीतर-ही-भीतर मेरा कलेजा जैसे बैठ रहा हो. मैं वहीं चारपाई पर सिर झुका कर बैठ गया. मुझे एक अजीब-सी लघुता का अनुभव हो रहा था. यदि मैं न मारता तो शायद वह न जाता.

    मैंने आंगन में नज़र दौड़ायी. एक ओर स्टूल पर उसका बिस्तर रखा था. अलगनी पर उसके कुछ कपड़े टंगे थे. स्टूल के नीचे वह भूरा जूता था, जो मेरे साले साहब के लड़के का था. मैं उठकर अलगनी के पास गया और उसके नेकर की जेब में हाथ डालकर उसके सामान निकालने लगा- वही गोलियां, पुराने ताश की गड्डी, खूबसूरत पत्थर, ब्लेड, कागज़ की नावें…

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