• आचार्य चाणक्य के 600 अनमोल विचार

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    आचार्य चाणक्य का जन्म आज से लगभग 2400 साल पूर्व हुआ था। वह नालंदा विशवविधालय के महान आचार्य थे। उन्होंने हमें ‘चाणक्य नीति’ जैसा ग्रन्थ दिया जो आज भी उतना ही प्रामाणिक है जितना उस काल में था। चाणक्य नीति एक 17 अध्यायों का ग्रन्थ है। अपने पाठको के लिए हम यह 17 अध्याय पहले ही अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर चुके है जो की आप इस लिंक पर पढ़ सकते है – सम्पूर्ण चाणक्य नीति। आचार्य चाणक्य ने चाणक्य नीति के अलावा सैकड़ों ऐसे कथन और कह थे जिन्हें की हर इंसान को पढ़ना, समझना और अपने जीवन में अपनाना चाहिए। हमने उनके ऐसे ही 600 कथनों और विचारों का संग्रह यहाँ आप सब के लिए किया है। आशा है आप सभी पाठकों को आचार्य चाणक्य के कोट्स का यह संग्रह जरूर पसंद आएगा।

    आचार्य चाणक्य के अनमोल विचार और कथन :-

    Quote 1: ऋण, शत्रु और रोग को समाप्त कर देना चाहिए।

    Quote 2: वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते है।

    Quote 3: शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें।

    Quote 4: सिंह भूखा होने पर भी तिनका नहीं खाता।

    Quote 5: एक ही देश के दो शत्रु परस्पर मित्र होते है।

    Quote 6: आपातकाल में स्नेह करने वाला ही मित्र होता है।

    Quote 7: मित्रों के संग्रह से बल प्राप्त होता है।

    Quote 8: जो धैर्यवान नहीं है, उसका न वर्तमान है न भविष्य।

    Quote 9: संकट में बुद्धि ही काम आती है।

    Quote 10: लोहे को लोहे से ही काटना चाहिए।

    Quote 11: यदि माता दुष्ट है तो उसे भी त्याग देना चाहिए।

    Quote 12: यदि स्वयं के हाथ में विष फ़ैल रहा है तो उसे काट देना चाहिए।

    Quote 13: सांप को दूध पिलाने से विष ही बढ़ता है, न की अमृत।

    Quote 14: एक बिगड़ैल गाय सौ कुत्तों से ज्यादा श्रेष्ठ है। अर्थात एक विपरीत स्वाभाव
    का परम हितैषी व्यक्ति, उन सौ लोगों से श्रेष्ठ है जो आपकी चापलूसी करते
    है।

    Quote 15: कल के मोर से आज का कबूतर भला। अर्थात संतोष सब बड़ा धन है।

    Quote 16: आग सिर में स्थापित करने पर भी जलाती है। अर्थात दुष्ट व्यक्ति का कितना भी सम्मान कर लें, वह सदा दुःख ही देता है।

    Quote 17: अन्न के सिवाय कोई दूसरा धन नहीं है।

    Quote 18: भूख के समान कोई दूसरा शत्रु नहीं है।

    Quote 19: विद्या ही निर्धन का धन है।

    Quote 20: विद्या को चोर भी नहीं चुरा सकता।

    Quote 21: शत्रु के गुण को भी ग्रहण करना चाहिए।

    Quote 22: अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।

    Quote 23: सभी प्रकार के भय से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है।

    Quote 24: किसी लक्ष्य की सिद्धि में कभी शत्रु का साथ न करें।

    Quote 25: आलसी का न वर्तमान होता है, न भविष्य।

    Quote 26: सोने के साथ मिलकर चांदी भी सोने जैसी दिखाई पड़ती है अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवश्य पड़ता है।

    Quote 27: ढेकुली नीचे सिर झुकाकर ही कुँए से जल निकालती है। अर्थात कपटी या पापी व्यक्ति सदैव मधुर वचन बोलकर अपना काम निकालते है।

    Quote 28: सत्य भी यदि अनुचित है तो उसे नहीं कहना चाहिए।

    Quote 29: समय का ध्यान नहीं रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में निर्विघ्न नहीं रहता।

    Quote 30: जो जिस कार्ये में कुशल हो उसे उसी कार्ये में लगना चाहिए।

    Quote 31: दोषहीन कार्यों का होना दुर्लभ होता है।

    Quote 32: किसी भी कार्य में पल भर का भी विलम्ब न करें।

    Quote 33: चंचल चित वाले के कार्य कभी समाप्त नहीं होते।

    Quote 34: पहले निश्चय करिएँ, फिर कार्य आरम्भ करें।

    Quote 35: भाग्य पुरुषार्थी के पीछे चलता है।

    Quote 36: अर्थ, धर्म और कर्म का आधार है।

    Quote 37: शत्रु दण्डनीति के ही योग्य है।

    Quote 38: कठोर वाणी अग्निदाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुंचाती है।

    Quote 39: व्यसनी व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता।

    Quote 40: शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करे।

    Quote 41: अपने से अधिक शक्तिशाली और समान बल वाले से शत्रुता न करे।

    Quote 42: मंत्रणा को गुप्त रखने से ही कार्य सिद्ध होता है।

    Quote 43: योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।

    Quote 44: एक अकेला पहिया नहीं चला करता।

    Quote 45: अविनीत स्वामी के होने से तो स्वामी का न होना अच्छा है।

    Quote 46: जिसकी आत्मा संयमित होती है, वही आत्मविजयी होता है।

    Quote 47: स्वभाव का अतिक्रमण अत्यंत कठिन है।

    Quote 48: धूर्त व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की सेवा करते हैं।

    Quote 49: कल की हज़ार कौड़ियों से आज की एक कौड़ी भली। अर्थात संतोष सबसे बड़ा धन है।

    Quote 50: दुष्ट स्त्री बुद्धिमान व्यक्ति के शरीर को भी निर्बल बना देती है।

    Quote 51: आग में आग नहीं डालनी चाहिए। अर्थात क्रोधी व्यक्ति को अधिक क्रोध नहीं दिलाना चाहिए।

    Quote 52: मनुष्य की वाणी ही विष और अमृत की खान है।

    Quote 53: दुष्ट की मित्रता से शत्रु की मित्रता अच्छी होती है।

    Quote 54: दूध के लिए हथिनी पालने की जरुरत नहीं होती। अर्थात आवश्कयता के अनुसार साधन जुटाने चाहिए।

    Quote 55: कठिन समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए।

    Quote 56: कल का कार्य आज ही कर ले।

    Quote 57: सुख का आधार धर्म है।

    Quote 58: धर्म का आधार अर्थ अर्थात धन है।

    Quote 59: अर्थ का आधार राज्य है।

    Quote 60: राज्य का आधार अपनी इन्द्रियों पर विजय पाना है।

    Quote 61: प्रकृति (सहज) रूप से प्रजा के संपन्न होने से नेताविहीन राज्य भी संचालित होता रहता है।

    Quote 62: वृद्धजन की सेवा ही विनय का आधार है।

    Quote 63: वृद्ध सेवा अर्थात ज्ञानियों की सेवा से ही ज्ञान प्राप्त होता है।

    Quote 64: ज्ञान से राजा अपनी आत्मा का परिष्कार करता है, सम्पादन करता है।

    Quote 65: आत्मविजयी सभी प्रकार की संपत्ति एकत्र करने में समर्थ होता है।

    Quote 66: जहां लक्ष्मी (धन) का निवास होता है, वहां सहज ही सुख-सम्पदा आ जुड़ती है।

    Quote 67: इन्द्रियों पर विजय का आधार विनर्मता है।

    Quote 68: प्रकर्ति का कोप सभी कोपों से बड़ा होता है।

    Quote 69: शासक को स्वयं योगय बनकर योगय प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए।

    Quote 70: योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।

    Quote 71: एक अकेला पहिया नहीं चला करता।

    Quote 72: सुख और दुःख में सामान रूप से सहायक होना चाहिए।

    Quote 73: स्वाभिमानी व्यक्ति प्रतिकूल विचारों कोसम्मुख रखकर दुबारा उन पर विचार करे।

    Quote 74: अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।

    Quote 75: शासक को स्वयं योग्य बनकर योग्य प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए।

    Quote 76: सुख और दुःख में समान रूप से सहायक होना चाहिए।

    Quote 77: स्वाभिमानी व्यक्ति प्रतिकूल विचारों को सम्मुख रखकर दोबारा उन पर विचार करे।

    Quote 78: अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी अपनी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।

    Quote 79: ज्ञानी और छल-कपट से रहित शुद्ध मन वाले व्यक्ति को ही मंत्री बनाए।

    Quote 80: समस्त कार्य पूर्व मंत्रणा से करने चाहिए।

    Quote 81: विचार अथवा मंत्रणा को गुप्त न रखने पर कार्य नष्ट हो जाता है।

    Quote 82: लापरवाही अथवा आलस्य से भेद खुल जाता है।

    Quote 83: सभी मार्गों से मंत्रणा की रक्षा करनी चाहिए।

    Quote 84: मन्त्रणा की सम्पति से ही राज्य का विकास होता है।

    Quote 85: मंत्रणा की गोपनीयता को सर्वोत्तम माना गया है।

    Quote 86: भविष्य के अन्धकार में छिपे कार्य के लिए श्रेष्ठ मंत्रणा दीपक के समान प्रकाश देने वाली है।

    Quote 87: मंत्रणा के समय कर्त्तव्य पालन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।

    Quote 88: मंत्रणा रूप आँखों से शत्रु के छिद्रों अर्थात उसकी कमजोरियों को देखा-परखा जाता है।

    Quote 89: राजा, गुप्तचर और मंत्री तीनो का एक मत होना किसी भी मंत्रणा की सफलता है।

    Quote 90: कार्य-अकार्य के तत्वदर्शी ही मंत्री होने चाहिए।

    Quote 91: छः कानो में पड़ने से (तीसरे व्यक्ति को पता पड़ने से) मंत्रणा का भेद खुल जाता है।

    Quote 92: अप्राप्त लाभ आदि राज्यतंत्र के चार आधार है।

    Quote 93: आलसी राजा अप्राप्त लाभ को प्राप्त नहीं करता।

    Quote 94: आलसी राजा प्राप्त वास्तु की रक्षा करने में असमर्थ होता है।

    Quote 95: आलसी राजा अपने विवेक की रक्षा नहीं कर सकता।

    Quote 96: आलसी राजा की प्रशंसा उसके सेवक भी नहीं करते।

    Quote 97: शक्तिशाली राजा लाभ को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।

    Quote 98: राज्यतंत्र को ही नीतिशास्त्र कहते है।

    Quote 99: राज्यतंत्र से संबंधित घरेलु और बाह्य, दोनों कर्तव्यों को राजतंत्र का अंग कहा जाता है।

    Quote 100: राज्य नीति का संबंध केवल अपने राज्य को सम्रद्धि प्रदान करने वाले मामलो से होता है।

    Quote 101: निर्बल राजा को तत्काल संधि करनी चाहिए।

    Quote 102: पडोसी राज्यों से सन्धियां तथा पारस्परिक व्यवहार का आदान-प्रदान और संबंध विच्छेद आदि का निर्वाह मंत्रिमंडल करता है।

    Quote 103: राज्य को नीतिशास्त्र के अनुसार चलना चाहिए।

    Quote 104: निकट के राज्य स्वभाव से शत्रु हो जाते है।

    Quote 105: किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही शत्रु मित्र बनता है।

    Quote 106: आवाप अर्थात दूसरे राष्ट्र से संबंध नीति का परिपालन मंत्रिमंडल का कार्य है।

    Quote 107: दुर्बल के साथ संधि न करे।

    Quote 108: ठंडा लोहा लोहे से नहीं जुड़ता।

    Quote 109: संधि करने वालो में तेज़ ही संधि का हेतु होता है।

    Quote 110: शत्रु के प्रयत्नों की समीक्षा करते रहना चाहिए।

    Quote 111: बलवान से युद्ध करना हाथियों से पैदल सेना को लड़ाने के समान है।

    Quote 112: कच्चा पात्र कच्चे पात्र से टकराकर टूट जाता है।

    Quote 113: संधि और एकता होने पर भी सतर्क रहे।

    Quote 114: शत्रुओं से अपने राज्य की पूर्ण रक्षा करें।

    Quote 115: शक्तिहीन को बलवान का आश्रय लेना चाहिए।

    Quote 116: दुर्बल के आश्रय से दुःख ही होता है।

    Quote 117: अग्नि के समान तेजस्वी जानकर ही किसी का सहारा लेना चाहिए।

    Quote 118: राजा के प्रतिकूल आचरण नहीं करना चाहिए।

    Quote 119: व्यक्ति को उट-पटांग अथवा गवार वेशभूषा धारण नहीं करनी चाहिए।

    Quote 120: देवता के चरित्र का अनुकरण नहीं करना चाहिए।

    Quote 121: ईर्ष्या करने वाले दो समान व्यक्तियों में विरोध पैदा कर देना चाहिए।

    Quote 122: चतुरंगणी सेना (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) होने पर भी इन्द्रियों के वश में रहने वाला राजा नष्ट हो जाता है।

    Quote 123: जुए में लिप्त रहने वाले के कार्य पूरे नहीं होते है।

    Quote 124: शिकारपरस्त राजा धर्म और अर्थ दोनों को नष्ट कर लेता है।

    Quote 125: शराबी व्यक्ति का कोई कार्य पूरा नहीं होता है।

    Quote 126: कामी पुरुष कोई कार्य नहीं कर सकता।

    Quote 127: पूर्वाग्रह से ग्रसित दंड देना लोकनिंदा का कारण बनता है।

    Quote 128: धन का लालची श्रीविहीन हो जाता है।

    Quote 129: दण्डनीति के उचित प्रयोग से ही प्रजा की रक्षा संभव है।

    Quote 130: दंड से सम्पदा का आयोजन होता है।

    Quote 131: दण्डनीति के प्रभावी न होने से मंत्रीगण भी बेलगाम होकर अप्रभावी हो जाते है।

    Quote 132: दंड का भय न होने से लोग अकार्य करने लगते है।

    Quote 133: दण्डनीति से आत्मरक्षा की जा सकती है।

    Quote 134: आत्मरक्षा से सबकी रक्षा होती है।

    Quote 135: आत्मसम्मान के हनन से विकास का विनाश हो जाता है।

    Quote 136: निर्बल राजा की आज्ञा की भी अवहेलना कदापि नहीं करनी चाहिए।

    Quote 137: अग्नि में दुर्बलता नहीं होती।

    Quote 138: दंड का निर्धारण विवेकसम्मत होना चाहिए।

    Quote 139: दंडनीति से राजा की प्रवति अर्थात स्वभाव का पता चलता है।

    Quote 140: स्वभाव का मूल अर्थ लाभ होता है।

    Quote 141: अर्थ कार्य का आधार है।

    Quote 142: धन होने पर अल्प प्रयत्न करने से कार्य पूर्ण हो जाते है।

    Quote 143: उपाय से सभी कार्य पूर्ण हो जाते है। कोई कार्य कठिन नहीं रहता।

    Quote 144: बिना उपाय के किए गए कार्य प्रयत्न करने पर भी बचाए नहीं जा सकते, नष्ट हो जाते है।

    Quote 145: कार्य करने वाले के लिए उपाय सहायक होता है।

    Quote 146: कार्य का स्वरुप निर्धारित हो जाने के बाद वह कार्य लक्ष्य बन जाता है।

    Quote 147: अस्थिर मन वाले की सोच स्थिर नहीं रहती।

    Quote 148: कार्य के मध्य में अति विलम्ब और आलस्य उचित नहीं है।

    Quote 149: कार्य-सिद्धि के लिए हस्त-कौशल का उपयोग करना चाहिए।

    Quote 150: भाग्य के विपरीत होने पर अच्छा कर्म भी दुखदायी हो जाता है।

    Quote 151: अशुभ कार्यों को नहीं करना चाहिए।

    Quote 152: समय को समझने वाला कार्य सिद्ध करता है।

    Quote 153: समय का ज्ञान न रखने वाले राजा का कर्म समय के द्वारा ही नष्ट हो जाता है।

    Quote 154: देश और फल का विचार करके कार्ये आरम्भ करें।

    Quote 155: नीतिवान पुरुष कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ही देश-काल की परीक्षा कर लेते है।

    Quote 156: परीक्षा करने से लक्ष्मी स्थिर रहती है।

    Quote 157: सभी प्रकार की सम्पति का सभी उपायों से संग्रह करना चाहिए।

    Quote 158: बिना विचार कार्ये करने वालो को भाग्यलक्ष्मी त्याग देती है।

    Quote 159: ज्ञान अर्थात अपने अनुभव और अनुमान के द्वारा कार्य की परीक्षा करें।

    Quote 160: उपायों को जानने वाला कठिन कार्यों को भी सहज बना लेता है।

    Quote 161: सिद्ध हुए कार्ये का प्रकाशन करना ही उचित कर्तव्य होना चाहिए।

    Quote 162: संयोग से तो एक कीड़ा भी स्तिथि में परिवर्तन कर देता है।

    Quote 163: अज्ञानी व्यक्ति के कार्य को बहुत अधिक महत्तव नहीं देना चाहिए।

    Quote 164: ज्ञानियों के कार्य भी भाग्य तथा मनुष्यों के दोष से दूषित हो जाते है।

    Quote 165: भाग्य का शमन शांति से करना चाहिए।

    Quote 166: मनुष्य के कार्ये में आई विपति को कुशलता से ठीक करना चाहिए।

    Quote 167: मुर्ख लोग कार्यों के मध्य कठिनाई उत्पन्न होने पर दोष ही निकाला करते है।

    Quote 168: कार्य की सिद्धि के लिए उदारता नहीं बरतनी चाहिए।

    Quote 169: दूध पीने के लिए गाय का बछड़ा अपनी माँ के थनों पर प्रहार करता है।

    Quote 170: जिन्हें भाग्य पर विश्वास नहीं होता, उनके कार्य पुरे नहीं होते।

    Quote 180: प्रयत्न न करने से कार्य में विघ्न पड़ता है।

    Quote 181: जो अपने कर्तव्यों से बचते है, वे अपने आश्रितों परिजनों का भरण-पोषण नहीं कर पाते।

    Quote 182: जो अपने कर्म को नहीं पहचानता, वह अँधा है।

    Quote 183: प्रत्यक्ष और परोक्ष साधनों के अनुमान से कार्य की परीक्षा करें।

    Quote 184: निम्न अनुष्ठानों (भूमि, धन-व्यापार उधोग-धंधों) से आय के साधन भी बढ़ते है।

    Quote 185: विचार न करके कार्ये करने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी त्याग देती है।

    Quote 186: परीक्षा किये बिना कार्य करने से कार्य विपत्ति में पड़ जाता है।

    Quote 187: परीक्षा करके विपत्ति को दूर करना चाहिए।

    Quote 188: अपनी शक्ति को जानकार ही कार्य करें।

    Quote 189: स्वजनों को तृप्त करके शेष भोजन से जो अपनी भूख शांत करता है, वाह अमृत भोजी कहलाता है।

    Quote 190: कायर व्यक्ति को कार्य की चिंता नहीं होती।

    Quote 191: अपने स्वामी के स्वभाव को जानकार ही आश्रित कर्मचारी कार्य करते है।

    Quote 192: गाय के स्वभाव को जानने वाला ही दूध का उपभोग करता है।

    Quote 193: नीच व्यक्ति के सम्मुख रहस्य और अपने दिल की बात नहीं करनी चाहिए।

    Quote 194: कोमल स्वभाव वाला व्यक्ति अपने आश्रितों से भी अपमानित होता है।

    Quote 195: कठोर दंड से सभी लोग घृणा करते है।

    Quote 196: राजा योग्य अर्थात उचित दंड देने वाला हो।

    Quote 197: अगम्भीर विद्वान को संसार में सम्मान नहीं मिलता।

    Quote 198: महाजन द्वारा अधिक धन संग्रह प्रजा को दुःख पहुँचाता है।

    Quote 199: अत्यधिक भार उठाने वाला व्यक्ति जल्दी थक जाता है।

    Quote 200: सभा के मध्य जो दूसरों के व्यक्तिगत दोष दिखाता है, वह स्वयं अपने दोष दिखाता है।

    Quote 201: मुर्ख लोगों का क्रोध उन्हीं का नाश करता है।

    Quote 202: सच्चे लोगो के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं।

    Quote 203: केवल साहस से कार्य-सिद्धि संभव नहीं।

    Quote 204: व्यसनी व्यक्ति लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही रुक जाता है।

    Quote 205: असंशय की स्तिथि में विनाश से अच्छा तो संशय की स्तिथि में हुआ विनाश होता है।

    Quote 206: दूसरे के धन पर भेदभाव रखना स्वार्थ है।

    Quote 207: न्याय विपरीत पाया धन, धन नहीं है।

    Quote 208: दान ही धर्म है।

    Quote 209: अज्ञानी लोगों द्वारा प्रचारित बातों पर चलने से जीवन व्यर्थ हो जाता है।

    Quote 210: न्याय ही धन है।

    Quote 211: जो धर्म और अर्थ की वृद्धि नहीं करता वह कामी है।

    Quote 212: धर्मार्थ विरोधी कार्य करने वाला अशांति उत्पन्न करता है।

    Quote 213: सीधे और सरल व्तक्ति दुर्लभता से मिलते है।

    Quote 214: निकृष्ट उपायों से प्राप्त धन की अवहेलना करने वाला व्यक्ति ही साधू होता है।

    Quote 215: बहुत से गुणों को एक ही दोष ग्रस लेता है।

    Quote 216: महात्मा को पराए बल पर साहस नहीं करना चाहिए।

    Quote 217: चरित्र का उल्लंघन कदापि नहीं करना चाहिए।

    Quote 218: विश्वास की रक्षा प्राण से भी अधिक करनी चाहिए।

    Quote 219: चुगलखोर श्रोता के पुत्र और पत्नी उसे त्याग देते है।

    Quote 220: बच्चों की सार्थक बातें ग्रहण करनी चाहिए।

    Quote 221: साधारण दोष देखकर महान गुणों को त्याज्य नहीं समझना चाहिए।

    Quote 222: ज्ञानियों में भी दोष सुलभ है।

    Quote 223: रत्न कभी खंडित नहीं होता। अर्थात विद्वान व्यक्ति में कोई साधारण दोष होने पर उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए।

    Quote 224: मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।

    Quote 225: शत्रु द्वारा किया गया स्नेहिल व्यवहार भी दोषयुक्त समझना चाहिए।

    Quote 226: सज्जन की राय का उल्लंघन न करें।

    Quote 227: गुणी व्यक्ति का आश्रय लेने से निर्गुणी भी गुणी हो जाता है।

    Quote 228: दूध में मिला जल भी दूध बन जाता है।

    Quote 229: मृतिका पिंड (मिट्टी का ढेला) भी फूलों की सुगंध देता है। अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवशय पड़ता है जैसे जिस मिटटी में फूल खिलते है उस मिट्टी से भी फूलों की सुगंध आने लगती है।

    Quote 230: मुर्ख व्यक्ति उपकार करने वाले का भी अपकार करता है। इसके विपरीत जो इसके विरुद्ध आचरण करता है, वह विद्वान कहलाता है।

    Quote 231: मछेरा जल में प्रवेश करके ही कुछ पाता है।

    Quote 231: राजा अपने बल-विक्रम से धनी होता है।

    Quote 233: शत्रु भी उत्साही व्यक्ति के वश में हो जाता है।

    Quote 234: उत्साहहीन व्यक्ति का भाग्य भी अंधकारमय हो जाता है।

    Quote 235: पाप कर्म करने वाले को क्रोध और भय की चिंता नहीं होती।

    Quote 236: अविश्वसनीय लोगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

    Quote 237: विष प्रत्येक स्तिथि में विष ही रहता है।

    Quote 238: कार्य करते समय शत्रु का साथ नहीं करना चाहिए।

    Quote 239: राजा की भलाई के लिए ही नीच का साथ करना चाहिए।

    Quote 240: संबंधों का आधार उद्देश्य की पूर्ति के लिए होता है।

    Quote 241: शत्रु का पुत्र यदि मित्र है तो उसकी रक्षा करनी चाहिए।

    Quote 242: शत्रु के छिद्र (दुर्बलता) पर ही प्रहार करना चाहिए।

    Quote 243: अपनी कमजोरी का प्रकाशन न करें।

    Quote 244: एक अंग का दोष भी पुरुष को दुखी करता है।

    Quote 245: शत्रु छिद्र (कमजोरी) पर ही प्रहार करते है।

    Quote 246: हाथ में आए शत्रु पर कभी विश्वास न करें।

    Quote 247: स्वजनों की बुरी आदतों का समाधान करना चाहिए।

    Quote 248: स्वजनों के अपमान से मनस्वी दुःखी होते है।

    Quote 249: सदाचार से शत्रु पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

    Quote 250: विकृतिप्रिय लोग नीचता का व्यवहार करते है।

    Quote 251: नीच व्यक्ति को उपदेश देना ठीक नहीं।

    Quote 252: नीच लोगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

    Quote 253: भली प्रकार से पूजने पर भी दुर्जन पीड़ा पहुंचाता है।

    Quote 254: कभी भी पुरुषार्थी का अपमान नहीं करना चाहिए।

    Quote 255: क्षमाशील पुरुष को कभी दुःखी न करें।

    Quote 256: क्षमा करने योग्य पुरुष को दुःखी न करें।

    Quote 257: स्वामी द्वारा एकांत में कहे गए गुप्त रहस्यों को मुर्ख व्यक्ति प्रकट कर देते हैं।

    Quote 258: अनुराग अर्थात प्रेम फल अथवा परिणाम से ज्ञात होता है।

    Quote 259: ज्ञान ऐश्वर्य का फल है।

    Quote 260: मुर्ख व्यक्ति दान देने में दुःख का अनुभव करता है।

    Quote 261: विवेकहीन व्यक्ति महान ऐश्वर्य पाने के बाद भी नष्ट हो जाते है।

    Quote 262: धैर्यवान व्यक्ति अपने धैर्ये से रोगों को भी जीत लेता है।

    Quote 263: गुणवान क्षुद्रता को त्याग देता है।

    Quote 264: कमजोर शरीर में बढ़ने वाले रोग की उपेक्षा न करें।

    Quote 265: शराबी के हाथ में थमें दूध को भी शराब ही समझा जाता है।

    Quote 266: यदि न खाने योग्य भोजन से पेट में बदहजमी हो जाए तो ऐसा भोजन कभी नहीं करना चाहिए।

    Quote 267: आवश्यकतानुसार कम भोजन करना ही स्वास्थ्य प्रदान करता है।

    Quote 268: खाने योग्य भी अपथ्य होने पर नहीं खाना चाहिए।

    Quote 269: दुष्ट के साथ नहीं रहना चाहिए।

    Quote 270: जब कार्यों की अधिकता हो, तब उस कार्य को पहले करें, जिससे अधिक फल प्राप्त होता है।

    Quote 271: अजीर्ण की स्थिति में भोजन दुःख पहुंचाता है।

    Quote 272:रोग शत्रु से भी बड़ा है।

    Quote 273: सामर्थ्य के अनुसार ही दान दें।

    Quote 274: चालाक और लोभी बेकार में घनिष्ठता को बढ़ाते है।

    Quote 275: लोभ बुद्धि पर छा जाता है, अर्थात बुद्धि को नष्ट कर देता है।

    Quote 276: अपने तथा अन्य लोगों के बिगड़े कार्यों का स्वयं निरिक्षण करना चाहिए।

    Quote 277: मूर्खों में साहस होता ही है। (यहाँ साहस का तात्पर्ये चोरी-चकारी, लूट-पाट, हत्या आदि से है )

    Quote 278: मूर्खों से विवाद नहीं करना चाहिए।

    Quote 279: मुर्ख से मूर्खों जैसी ही भाषा बोलें।

    Quote 280: मुर्ख का कोई मित्र नहीं है।

    Quote 281: धर्म के समान कोई मित्र नहीं है।

    Quote 282: धर्म ही लोक को धारण करता है।

    Quote 283: प्रेत भी धर्म-अधर्म का पालन करते है।

    Quote 284: दया धरम की जन्मभूमि है।

    Quote 285: धर्म का आधार ही सत्य और दान है।

    Quote 286: धर्म के द्वारा ही लोक विजय होती है।

    Quote 287: मृत्यु भी धरम पर चलने वाले व्यक्ति की रक्षा करती है।

    Quote 288: जहाँ पाप होता है, वहां धर्म का अपमान होता है।

    Quote 289: लोक-व्यवहार में कुशल व्यक्ति ही बुद्धिमान है।

    Quote 290: सज्जन को बुरा आचरण नहीं करना चाहिए।

    Quote 291: विनाश का उपस्थित होना सहज प्रकर्ति से ही जाना जा सकता है।

    Quote 292: अधर्म बुद्धि से आत्मविनाश की सुचना मिलती है।

    Quote 293: चुगलखोर व्यक्ति के सम्मुख कभी गोपनीय रहस्य न खोलें।

    Quote 294: राजा के सेवकों का कठोर होना अधर्म माना जाता है।

    Quote 295: दूसरों की रहस्यमयी बातों को नहीं सुनना चाहिए।

    Quote 296: स्वजनों की सीमा का अतिक्रमण न करें।

    Quote 297: पराया व्यक्ति यदि हितैषी हो तो वह भाई है।

    Quote 298: उदासीन होकर शत्रु की उपेक्षा न करें।

    Quote 299: अल्प व्यसन भी दुःख देने वाला होता है।

    Quote 300: स्वयं को अमर मानकर धन का संग्रह करें।

    Quote 301: धनवान व्यक्ति का सारा संसार सम्मान करता है।

    Quote 302: धनविहीन महान राजा का संसार सम्मान नहीं करता।

    Quote 303: दरिद्र मनुष्य का जीवन मृत्यु के समान है।

    Quote 304: धनवान असुंदर व्यक्ति भी सुरुपवान कहलाता है।

    Quote 305: याचक कंजूस-से-कंजूस धनवान को भी नहीं छोड़ते।

    Quote 306: उपार्जित धन का त्याग ही उसकी रक्षा है। अर्थात उपार्जित धन को लोक हित के कार्यों में खर्च करके सुरक्षित कर लेना चाहिए।

    Quote 307: अकुलीन धनिक भी कुलीन से श्रेष्ठ है।

    Quote 308: नीच व्यक्ति को अपमान का भय नहीं होता।

    Quote 309: कुशल लोगों को रोजगार का भय नहीं होता।

    Quote 310: जितेन्द्रिय व्यक्ति को विषय-वासनाओं का भय नहीं सताता।

    Quote 311: कर्म करने वाले को मृत्यु का भय नहीं सताता।

    Quote 312: साधू पुरुष किसी के भी धन को अपना ही मानते है।

    Quote 313: दूसरे के धन अथवा वैभव का लालच नहीं करना चाहिए।

    Quote 314: मृत व्यक्ति का औषधि से क्या प्रयोजन।

    Quote 315: दूसरे के धन का लोभ नाश का कारण होता है।

    Quote 316: दूसरे का धन किंचिद् भी नहीं चुराना चाहिए।

    Quote 317: दूसरों के धन का अपहरण करने से स्वयं अपने ही धन का नाश हो जाता है।

    Quote 318: चोर कर्म से बढ़कर कष्टदायक मृत्यु पाश भी नहीं है।

    Quote 319: जीवन के लिए सत्तू (जौ का भुना हुआ आटा) भी काफी होता है।

    Quote 320: हर पल अपने प्रभुत्व को बनाए रखना ही कर्त्यव है।

    Quote 321: नीच की विधाएँ पाप कर्मों का ही आयोजन करती है।

    Quote 322: निकम्मे अथवा आलसी व्यक्ति को भूख का कष्ट झेलना पड़ता है।

    Quote 323: भूखा व्यक्ति अखाद्य को भी खा जाता है।

    Quote 324: इंद्रियों के अत्यधिक प्रयोग से बुढ़ापा आना शुरू हो जाता है।

    Quote 325: संपन्न और दयालु स्वामी की ही नौकरी करनी चाहिए।

    Quote 326: लोभी और कंजूस स्वामी से कुछ पाना जुगनू से आग प्राप्त करने के समान है।

    Quote 327: विशेषज्ञ व्यक्ति को स्वामी का आश्रय ग्रहण करना चाहिए।

    Quote 328: उचित समय पर सम्भोग (sex) सुख न मिलने से स्त्री बूढी हो जाती है।

    Quote 329: नीच और उत्तम कुल के बीच में विवाह संबंध नहीं होने चाहिए।

    Quote 330: न जाने योग्य जगहों पर जाने से आयु, यश और पुण्य क्षीण हो जाते है।

    Quote 331: अधिक मैथुन (सेक्स) से पुरुष बूढ़ा हो जाता है।

    Quote 332: अहंकार से बड़ा मनुष्य का कोई शत्रु नहीं।

    Quote 333: सभा के मध्य शत्रु पर क्रोध न करें।

    Quote 334: शत्रु की बुरी आदतों को सुनकर कानों को सुख मिलता है।

    Quote 335: धनहीन की बुद्धि दिखाई नहीं देती।

    Quote 336: निर्धन व्यक्ति की हितकारी बातों को भी कोई नहीं सुनता।

    Quote 337: निर्धन व्यक्ति की पत्नी भी उसकी बात नहीं मानती।

    Quote 338: पुष्पहीन होने पर सदा साथ रहने वाला भौरा वृक्ष को त्याग देता है।

    Quote 339: विद्या से विद्वान की ख्याति होती है।

    Quote 340: यश शरीर को नष्ट नहीं करता।

    Quote 341: जो दूसरों की भलाई के लिए समर्पित है, वही सच्चा पुरुष है।

    Quote 342: शास्त्रों के ज्ञान से इन्द्रियों को वश में किया जा सकता है।

    Quote 343: गलत कार्यों में लगने वाले व्यक्ति को शास्त्रज्ञान ही रोक पाते है।

    Quote 344: नीच व्यक्ति की शिक्षा की अवहेलना करनी चाहिए।

    Quote 345: मलेच्छ अर्थात नीच की भाषा कभी शिक्षा नहीं देती।

    Quote 346: मलेच्छ अर्थात नीच व्यक्ति की भी यदि कोई अच्छी बात हो अपना लेना चाहिए।

    Quote 347: गुणों से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।

    Quote 348: विष में यदि अमृत हो तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।

    Quote 349: विशेष स्थिति में ही पुरुष सम्मान पाता है।

    Quote 350: सदैव आर्यों (श्रेष्ठ जन) के समान ही आचरण करना चाहिए।

    Quote 351: मर्यादा का कभी उल्लंघन न करें।

    Quote 352: विद्वान और प्रबुद्ध व्यक्ति समाज के रत्न है।

    Quote 353: स्त्री रत्न से बढ़कर कोई दूसरा रत्न नहीं है।

    Quote 354: रत्नों की प्राप्ति बहुत कठिन है। अर्थात श्रेष्ठ नर और नारियों की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है।

    Quote 355: शास्त्र का ज्ञान आलसी को नहीं हो सकता।

    Quote 356: स्त्री के प्रति आसक्त रहने वाले पुरुष को न स्वर्ग मिलता है, न धर्म-कर्म।

    Quote 357: स्त्री भी नपुंसक व्यक्ति का अपमान कर देती है।

    Quote 358: फूलों की इच्छा रखने वाला सूखे पेड़ को नहीं सींचता।

    Quote 359: बिना प्रयत्न किए धन प्राप्ति की इच्छा करना बालू में से तेल निकालने के समान है।

    Quote 360: महान व्यक्तियों का उपहास नहीं करना चाहिए।

    Quote 361: कार्य के लक्षण ही सफलता-असफलता के संकेत दे देते है।

    Quote 362: नक्षत्रों द्वारा भी किसी कार्य के होने, न होने का पता चल जाता है।

    Quote 363: अपने कार्य की शीघ्र सिद्धि चाहने वाला व्यक्ति नक्षत्रों की परीक्षा नहीं करता।

    Quote 364: परिचय हो जाने के बाद दोष नहीं छिपाते।

    Quote 365: स्वयं अशुद्ध व्यक्ति दूसरे से भी अशुद्धता की शंका करता है।

    Quote 366: अपराध के अनुरूप ही दंड दें।

    Quote 367: कथन के अनुसार ही उत्तर दें।

    Quote 368: वैभव के अनुरूप ही आभूषण और वस्त्र धारण करें।

    Quote 369: अपने कुल अर्थात वंश के अनुसार ही व्यवहार करें।

    Quote 370: कार्य के अनुरूप प्रयत्न करें।

    Quote 371: पात्र के अनुरूप दान दें।

    Quote 372: उम्र के अनुरूप ही वेश धारण करें।

    Quote 373: सेवक को स्वामी के अनुकूल कार्य करने चाहिए।

    Quote 374: पति के वश में रहने वाली पत्नी ही व्यवहार के अनुकूल होती है।

    Quote 375: शिष्य को गुरु के वश में होकर कार्य करना चाहिए।

    Quote 376: पुत्र को पिता के अनुकूल आचरण करना चाहिए।

    Quote 377: अत्यधिक आदर-सत्कार से शंका उत्पन्न हो जाती है।

    Quote 378: स्वामी के क्रोधित होने पर स्वामी के अनुरूप ही काम करें।

    Quote 379: माता द्वारा प्रताड़ित बालक माता के पास जाकर ही रोता है।

    Quote 380: स्नेह करने वालों का रोष अल्प समय के लिए होता है।

    Quote 381: मुर्ख व्यक्ति को अपने दोष दिखाई नहीं देते, उसे दूसरे के दोष ही दिखाई देते हैं।

    Quote 382: स्वार्थ पूर्ति हेतु दी जाने वाली भेंट ही उनकी सेवा है।

    Quote 383: बहुत दिनों से परिचित व्यक्ति की अत्यधिक सेवा शंका उत्पन्न करती है।

    Quote 384: अति आसक्ति दोष उत्पन्न करती है।

    Quote 385: शांत व्यक्ति सबको अपना बना लेता है।

    Quote 386: बुरे व्यक्ति पर क्रोध करने से पूर्व अपने आप पर ही क्रोध करना चाहिए।

    Quote 387: बुद्धिमान व्यक्ति को मुर्ख, मित्र, गुरु और अपने प्रियजनों से विवाद नहीं करना चाहिए।

    Quote 388: ऐश्वर्य पैशाचिकता से अलग नहीं होता।

    Quote 389: स्त्री में गंभीरता न होकर चंचलता होती है।

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