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Dakaitee - Hindi Story by Prem Pradeep
  • डकैती - हिन्दी कहानी - लेखक प्रेम प्रदीप

  • सामान्य से कद काठी के शर्मा जी । साधारण दिनचर्या । सहज सोच ।गॉव से शहर आये ।

    श्रम किया । संघर्ष किया । एक छोटा सा कमरा किराये पर लेने का सामर्थ्य जुटा पाये । दिन भर की थकान के बाद जब भी अवसर मिला ओवरटाईम की एस्ट्रा इंकम के लिये जुटे रहे ।

    कमरे के किराये के साथ बच्चों की शिक्षा के लिये भी कुछ जुटा पाये तो गॉव से बच्चों को भी बुला लिया शहर I
    गॉव में बूढ़े पिता । शहर आने के लिये तैयार नहीं । देखभाल के लिये पत्नी को गॉव में रख छोड़ा ।

    शर्मा जी सुबह उठते ही बच्चों का टिफिन तैयार करते । आफिस जाते । शाम को घर आ बच्चों को पढ़ाते । कुल मिला कर माँ -बाप दोनो की दोहरी भूमिका को अकेले जी रहे थे शर्मा जी I

    बच्चे भी लायक ।मेघावी । शहर के स्कूल में प्रथम वर्ष से ही हर परीक्षा में प्रथम । धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदलती रहीं । शर्मा जी अस्थायी कर्मचारी से शुरु कर आफिस सुपरिटेंडेंट के पद तक जा पहुँचे । बच्चे भी सफल और सम्मान जनक मुकाम पर I

    बड़ा बेटा डॉक्टर । छोटा बेटा सॉफ्टवेयर इंजीनियर । दोनो ही विनम्र , आज्ञाकारी । इस बीच शर्मा जी की पत्नी भी ससुर की सेवा और समर्पण से निवृत्त हो शहर आ गई I

    जीवन सफल हुआ . . इसका वाचिक संवाद तो कभी नहीं किया शर्मा जी ने लेकिन उनके चेहरे पर आत्मिक संतोष की प्रतिछाया अभिव्यक्त कर देती थी अक्सर I

    दोनो के विवाह की जिम्मेवारी से मुक्त हो लिया जाये . . अब यही विमर्श होता था शर्मा जी और उनकी पत्नी के बीच । कुछ रिश्ते आये I कुछ तलाशे गये । अंततः रिश्ता तय हुआ I शिक्षित ,सुंदर युवती . . संस्कारों की पूर्णता के साथ प्रथम दृष्टया ही बहू के योग्य लगी । सो चट मंगनी , पट ब्याह । उस दिन शर्मा जी का उत्साह और हर्ष देखने योग्य था I

    विवाह संम्पन्न हुआ । शर्मा जी ने बहू के रूप में बेटी की कल्पना की थी ।प्रारंभ में प्रतीत हुआ कल्पना सार्थक रही । बहू ने मान भी पाया । सम्मान भी दिया I इस बीच बेटा भी डाक्टरी मे पीजी के बाद स्पेशलाइज्ड कोर्स कर दूर शहर के प्रतिष्ठित अस्पताल में सेवारत् हो चुका था । शर्मा जी समय के साथ चलने वाले व्यक्ति थे I
    "अकेले कब तक बाहर खाओगे / बनाओगे . . बहू को साथ ले जाओ . . एक दिन डाक्टर बेटे से कहा I डाक्टर बेटे ने भी पूर्ववर्ती आचरण अनुचार अनुसार " जी पापा जी . . कहा ।

    अब दूर शहर में बहू -बेटा . . और यहाँ शर्मा जी उनकी पत्नी I शर्मा जी अपनी बनाई -बसाई छोटी सी दुनिया से कैसे बाहर जा सकते थे I रोज फोन लगाते बेटे-बहू को ।
    पहले यही अनुक्रम बेटे का भी था । रोज फोन लगा कर पूछ्ता . . पापा जी स्वास्थ्य कैसा है ? दवाई टाईम पर खा रहें हैं न ? रूटीन चेक अप करवाते रहिये . .

    धीरे-धीरे फोन लगाने का नियमित कर्म एकतरफा सा हो गया I अक्सर शर्मा जी ही लगाते । कभी बेटे से बात होती तो कभी बहू से । साधारण कद काठी के शर्मा जी ने जीवन के बड़े उतार-चढ़ाव देखे थे I कई रंग देखे थे । अनगिनत मौसम देखे थे । व्यवहार के परिवर्तन को भाँप रहे थे लेकिन अक्सर पत्नी से कहते . . व्यस्त रहता होगा । बड़े संस्थानों में बड़ी जिम्मेवारियाँ होती हैं । जब भी वो ऐसा कहते मै महसूस करता उनके भीतर की टूटन को शब्दों के लहराव में उतरते ।जीवन भर स्पष्ट वादी रहे शर्मा जी इस वक्त स्वंयम् को भ्रम में ही रख संतोषी रहना चाहते थे . . संभवतः . .

    भ्रम . . ये भ्रम ही है जो जीवन को ऊर्जा देता है । सत्य तो क्षण में जीवन घोंट ले ।

    किंतु भ्रम क्षणिक ही होता है । सत्य निष्ठुरता के साथ स्वयम् को उद्घाटित करता ही है I शर्मा जी के साथ भी हुआ । बेटे -बहू नवआंगतुक मेहमान की सूचना के साथ घर आये । शर्मा जी की अनपढ़ पत्नी अपने चार बच्चों की परवरिश ,वृद्ध ससुर की सेवा और सांसारिक संबंधों के निर्वाह के अनुभवों के साथ पूर्णतः हर्षित , नव ऊर्जित , नव आंगतुक की व्यवस्था के सुव्यवस्थित . . .

    शर्मा जी दादा बन गये ।नवजात नातिन को हाथों में उठाते शर्मा जी के हाथ कांप रहे थे । संभवतः वह आत्मिक आल्हाद का कंपन था । शर्मा जी की पत्नी नातिन और बहू की सेवा में व्यस्त -मस्त . . .

    आप रहने दीजिये । मै ठीक से कर लूंगी . . बहू ने व्यंग्यात्मक कटाक्ष के साथ शर्मा जी की पत्नी के हाथों से नवजात् को लगभग खींचते कहा ।

    " मम्मी . . आजकल के बच्चे बड़े सेंसेटिव होते हैं । बहुत केयर करनी होती है । आप परेशान न हो । निरूपमा सब प्रापर कर लेगी . . सामने सोफे पर बैठे डाक्टर बेटे ने कहा । शर्मा जी चेहरे पर निर्भाव लिये सुन रहे थे । देख रहे थे । अपमान बोध के साथ बगल के सोफे फर ढ़हती अर्धानंगी को । बड़ी मुश्किल से भांप पाया था मै उस क्षण भी शर्मा जी की ऑखो में उतर आई नमी को . .

    सुनो बेटा . . . .
    पापा एक मिनिट रूकिये । निरूपमा आवाज दे रही है ।

    बहू को उठा दे . . चाय बन गई है . .
    मम्मी . . रात भर जागना होता है उसे । तुम्हारी शैतान नातिन के लिये । अभी सोने ही दो . . .

    पापा चलता हूँ . . . पॉव छूने की औपचारिकता के बीच शर्मा जी बराबर देख पा रहे थे डाक्टर बेटे के कृत्रिम सम्मान को । देख पा रहे थे विजयी मुस्कान के साथ गर्वित बेटी स्वरूप बहू के बहु रूप को ।

    खुश रहो . . लगभग निढ़ाल से पड़े शर्मा जी खुद को सहज बनाने का प्रयास करते हुये बोले ।

    और उस क्षण मै महसूस करता रहा शर्मा जी के श्रम , संघर्ष, समर्पण को लुटते हुये . . और शर्मा जी विचारमग्न कि संस्कार देने में चूक हुई उनसे . . या संस्कारित बहू के चुनाव में . . . . .

    खैर डकैती तो पड़ ही चुकी थी I क्या फर्क पड़ता है कि लूट के लिये सांकल भीतर से खोली गई या बाहर से

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