• हिंदी कहानी : आत्‍माएँ बोल सकती हैं, रचनाकार : डॉ. ललितसिंंह राजपुरोहित

  • आत्‍माएँ बोल सकती हैं Spirits can talk


    जब तक चाय-पत्ती पूरी उबल नहीं जाती, मैं उसमें दूध नहीं मिलाता और दूध मिलाने से पहले अदरक को बारीक कूटकर उबलती हुई चाय में डालना तो बिल्‍कुल नहीं भूलता। सबका अपना-अपना चाय बनाने का तरीका और सबका अपना-अपना स्‍वाद। नई दुल्‍हन के हाथों में रची हुई मेहंदी सी,  दीवारों पर पुते हुए नए रंगों की खुश्‍बू में नहाई हुई रसोई में,  मैं अपने नए घर में पहली चाय बनाते समय कई प्रकार के ख्‍यालों में बहा जा रहा था।  चाय की महक रसोई में चारों ओर छितराई हुई थी। बाहरवीं मंजिल पर बने फ्लेट की खिड़की के दूसरी ओर दैत्‍याकार बिल्डिंग अट्टहास करती हुई सी दिखायी दे रही थी। रसोई के अंदर और रसोई की खड़की के बाहर, दोनो ओर एक अबूझ सा अबोलापन सा फैला हुआ था।

    दो महीने पहले जब कंपनी में मेरा प्रमोशन हुआ तब से मैं नए घर की तलाश में था। पुराना घर ठीक-ठाक ही था मगर उसमें कार पार्किंग की सुविधा न थी। इसलिए कार को गली में ही पार्क करना पड़ता। बच्‍चे भी अब बड़े हो रहे थे, फिर बच्चों की पढ़ाई के लिए अलग स्‍टडीरूम से की आवश्यकता भी बनी हुई थी। तो हम मिया बीवी ने एक बड़ा सा नया घर लेना ही उचित समझा।  घर पंसद करने और मोल भाव करने में ही एक महीना बीत गया। इसी बीच गर्मियों की छुट्टियाँ हो गई, बच्‍चे अपने ननिहाल चले गएं। सोचा कि जब बच्चे आएंगे तो उन्हें एक सरप्राइज दूँगा, ऑफिस से छुट्टी ली और सारा सामान नए घर में शिफ्ट कर दिया। घर में एक-एक चीज को करीने से सजाते वक्‍त जब दीवार पर बच्चों की फोटो टांग रहा था तो बरबस यही सोच रहा था कि जब वे इस नए घर में आएंगे तो कितना ऊधम मचाएंगे।  घर की बालकनी को देखकर कितना खुश होंगे। इसी उधेड़-बुन में चाय बनाने के लिए रसोई में आया।  चाय की महक के साथ-साथ मेरे मन में चल रहे कई विचार रसोई में यहाँ-वहाँ बिखरने लगे।  

    ट्रिंग... ट्रिंग… डोरबेल बजी। डोरबेल की आवाज के साथ ही विचारों के झंझावात एकदम से गायब हो गए और मैं ऊहापोह की दुनिया से वापस लौट आया। गैस स्‍टोव की आंच को धीमा कर मेनडोर खोलने के लिए आगे बढ़ा।  

    ‘अंकल अंदर आ जाऊँ…!’ दरवाजा खोलते ही दस-बारह साल के एक बच्‍चे की आवाज़ कानों में गूँजी। इस पहले कि मैं हाँ कहने का तकल्लुफ करता वो भीतर आया और डाइनिंग हाल के सोफे पर धम्‍म से पसर गया।

    ‘चाय पियोगे बेटा…?’ मैंने चाय को छानकर कप में डालते हुए पूछा।  

    ‘नहीं अंकल मैं चाय नहीं पीता। मम्‍मी कहती है अजनबियों के हाथ से कुछ नहीं लेना चाहिए। आपको आपकी मम्‍मी ने  ये सब नहीं बताया?’  उसने वापस मेरी तरफ सवाल दागते हुए कहा। सोफे पर वह एकदम शांतभाव से बैठा हुआ था लेकिन उसके पॉंव पेंडुलम की तरह कभी दाएँ तो कभी बाएँ हिलडुल रहे थे। मैं उसकी हाजिरजवाबी पर मुस्‍कुरा रहा था।

    ‘अच्‍छा ठीक है बाबा... जब हमारा परिचय हो जाएगा तब तुम यह बिस्‍किट खा लेना।’  मैंने उसके सामने काफी-टेबल पर  प्‍लेट में बिस्‍किट भरकर रख दिए और खुद सोफे पर बैठकर गर्मागर्म चाय की चुस्कियाँ लेने लगा। उसकी ललचायी नज़रे एकटक प्‍लेट को देख रही थीं और मेरी नजरें उसके मासूम चहरे को निहार रही थीं। पीले रंग की टीशर्ट और नेवी ब्‍लू रंग की हाफ पैंट उस पर बहुत फब रही थी। सफेद मोजों से उसने अपने पैरो को घुटनों तक ढक रखा था। सर के बाल हालांकि छोटे थे पर सलीके से बनाए हुए थे।

    ‘तुम्‍हारे मम्‍मी पापा क्‍या करते हैं?’ बच्‍चे के बारे में और अधिक जानने के लिए मैंने बात शुरू की।

    ‘पापा आफिस जाते थे और मम्‍मी मेरे साथ रहती है। ओह्हो मम्‍मी भी न... पूरा दिन मेरा ध्‍यान रखती है।  एक बार भी मुझे दूर नहीं जाने देती, हर वक्‍त मेरे आगे-पीछे मंडराती रहती है। आप जानते हैं...? मम्‍मी को तो पता भी नहीं है कि मैं चुपके से आपके यहाँ आ गया हूँ।’  उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया।

     ‘यह तो गलत बात है बेटा... आपको मम्‍मी को बताकर आना चाहिए था। अच्‍छा यह बताओ पापा अब आफिस क्यूँ नहीं जाते? उनकी तबीयत तो ठीक है न?’  मैंने विस्‍मय के साथ उससे पूछा।  

    ‘अरे नहीं अंकल... वो तो अब भी आफिस जाते हैं... मगर आजकल पापा हमारे हमारे साथ नहीं रहते न...। मैं और मेरी मम्‍मी बस दोनों ही रहते हैं।’  उसने संजीदगी के साथ बाल-सुलभ शैली में जवाब दिया।

    अच्‍छा कहाँ  रहते हो तुम?  

    इसी बिल्‍डिंग में…।  

    मेरा मतलब तुम्‍हारा घर का नंबर क्‍या है? कौनसे फ्लोर में?

    इसी फ्लोर में अंकल ... आपके आस-पास ही तो रहते हैं। कमाल है, आपने हमें देखा नहीं ?

    बेटा कल ही तो सारा सामान शिफ्ट हुआ है और आज ही मैं यहाँ रहने आया हूँ... इसलिए शायद आप लोगों से मिल नहीं पाया।

    आप अकेले हो अंकल? और कोई नहीं घर में?

    हम्‍म.... गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही है ना बेटा... सो बच्चे अपनी मम्मी के साथ ननिहाल गए हुए हैं।

    ओह्ह... अच्‍छा...  अंकल आप इसी घर में रहने क्यूँ आए हैं आपके पास अपना कोई घर नहीं है?

    हाँ  था न... मगर वो छोटा घर था।

    ‘अंकल मेरी मम्‍मी कहती है कि घर छोटे-बड़े नहीं होते, घर में रहने वाले लोग छोटे बड़े होते हैं।  घर की जरूरतें बड़ी होती हैं आदमी तो हमेशा छोटा ही रहता है।’ उसके मुँह से इतनी बड़ी बात सुनकर मैं हतप्रभ रह गया और अपनी फटी आँखों से उसकी ओर ताकने लगा। बच्‍चे की बात का क्‍या जबाब दूँ, कुछ सूझ ही नहीं रहा था। उसके पैरों के हिलने डुलने का क्रम अब भी अनवरत रूप से जारी था।

    ‘अच्‍छा बेटा तुम कौनसी क्‍लास में पढ़ते हो?’ विषय बदलने के आशय से मैंने उससे पूछा।

    तीसरी में.... पर अब मैं स्‍कूल नहीं जाता।

    ओह... छुट्टियाँ हैं इसलिए न?

    नहीं अंकल.... छुट्टियाँ शुरू होने से पहले भी मैं स्‍कूल नहीं जा रहा था।  

    मगर क्यूँ?

    वो मम्‍मी नहीं जाने देती न...।

    ‘वही तो क्यूँ नहीं जाने देती?’ मैं बच्‍चे की बात सुनकर ऐसे विस्मित हुआ जा रहा था जैसे किसी संस्‍पेस की बू आ रही हो। मैंने खाली कप को टेबल पर रखा और उसके पास जाकर बैठ गया।

    वो मुझे नहीं पता अंकल... मम्‍मी हर वक्‍त मेरे आस पास ही रहती है मुझे अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाती और न ही मुझे खेलने के लिए जाने देती है।  

    तुम्हारे पापा का क्‍या नाम है बेटा?

    ‘डॉ. सुमित अवस्‍थी।’  उसने बिस्‍कुट की ओर ललचायी नजरों से देखते हुए अपने पापा का नाम बताया। पैर घड़ी के पेंडुलम की तरह लगातार हिलडुल रहे थे।

    ‘सुमित अवस्‍थी….! नाम कुछ सुना-सुना सा लग रहा था, इस घर में जो पहले किरायेदार रहते थे कहीं वो तो नहीं? मकान किराये  लेते समय जब मैंने इस घर में पहले रहने वाले लोगों के बारे में जानकारी ली तो मुझे पता चला था कि कुछ महीने पहले ही कार एक्‍सीडेंट में उसकी पत्‍नी और बच्‍चे की जान चली गई थी। उसके बाद उसने शहर छोड़ दिया और अपने गॉंव चला गया। एक बड़ी नामी आईटी कंपनी में मेनेजर था। अब बहुत से लोगों का नाम सुमित अवस्थी होता है, किसी एक का तो इस नाम पर अपना कॉपीराइट नहीं, शायद कोई संयोग होगा कि इस घर के पुराने किरायेदार और इस बच्‍चे के पिता का नाम एक जैसा ही है।’  मैं मन ही मन बुदबुदाया।

    और... तुम्‍हारा क्‍या नाम है बेटा ?

    मेरा नाम....!  मेरा नाम है अमित... पर मम्‍मी मुझे अम्मू कहकर बुलाती है।  मम्मी के मुँह से अम्मू सुनना अच्‍छा लगता है। अंकल आपको कौनसा अच्‍छा लगा?

    हम्‍म मैं भी तुम्‍हें अम्मू नाम से ही पुकारूंगा... ठीक रहेगा न?

    ‘अंकल ये बैटबाल किसका है?’  सोफे से उठकर वह डाइनिंग-हाल के एक कोने में रखे बैटबाल को निहारते हुए पूछने लगा।

    मेरे लड़के का है, तुम्हारी उम्र का ही है वो, जब वो ननिहाल से लौट कर आएगा ना तो मैं तुम्हारी उसके साथ दोस्ती करा दूँगा फिर तुम जी भरकर उसके साथ खेलना…।  मगर तुम अभी खेलना चाहो तो इससे खेल सकते हो।  

    नहीं अंकल... नहीं खेल सकता। आजकल मैं चीजों को संभाल ही नहीं पाता... कभी पकड़ में नहीं आती और कभी छूट जाती है।

    ऐसा क्यूँ बेटा ?

    ‘पता नहीं अंकल... मम्‍मी कहती है मैं कमजोर हो गया हूँ, हवा से भी हल्का। इसलिए मैं देख तो सकता हूँ मगर पकड़ नहीं सकता।’  कहते हुए अमित के चहरे के भाव बदल गए।

    ऐसा थोड़ी न होता है, मम्‍मी तुमसे मजाक कर रही होगी बेटा। तुम यहाँ आकर कभी भी खेल सकते हो।

    ‘कहाँ जाऊँगा अंकल... यहीं तो रहता हूँ।’ उसने मेरी ओर से ध्‍यान हटा लिया और एक कमरे से दूसरे कमरे में अकारण सा घूमने लगा। फिर बालकनी में खड़ा होकर सामने वाली बिल्‍डिंग को निहारने लगा।

    अंकल... वो सामने वाली... हरे पर्दों से जो ढकी खिड़की है न... वो  चिंटू का घर है। मैं और चिंटू एक ही क्‍लास में पढ़ते हैं... वो मेरा सबसे अच्‍छा दोस्‍त है। मेरा मन करता है मैं उसके साथ जाकर खेलूं पर मम्‍मी भी न.. जाने ही नहीं देती। अंकल आप ले जाएंगे मुझे कभी उसके पास।

    हाँ ले जाऊँगा बेटा। ऐसा करो आज तुम मेरे साथ खेल लो। अच्‍छा बताओ क्‍या पंसद है तुम्‍हें इनडोर गेम में ..?

    मुझे...? हूँsss... मुझे तो कार्ड खेलना पसंद है।

    कार्ड…? मगर यह तो बड़े लोगों का गेम है। बच्‍चों को नहीं खेलना चाहिए ।

    ओह्हो अंकल... आपको तो कुछ पता ही नहीं... वो कार्ड क्रिकेट प्लेइंग कार्ड है, उसमें  क्रिकेटर ने कितने रन बनाए, कितने विकेट लिए यह सब लिखा होता है। मुझे वो वाले कार्ड खेलना पसंद है।

    ओह माय गॉड... मुझे तो पता ही नहीं था। पर मेरे पास तो इस तरह के कार्ड अभी नहीं हैं बेटा।

    अम्मू थोड़ी देर के चुप हो गया।  बालकनी से निकलकर बाथरूम के पास आया और बाथरूम के ऊपर बने अटारीनुमा दुछत्ती की ओर तांकने लगा। उसके विचित्र व्‍यवहार से मैं अंचभित सा उसके पास जाकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर के लिए कमरे में एक बार फिर अबोलापन छा गया।  

    ‘क्‍या हुआ बेटा? क्‍या सोच रहे हो?’  मैंने निस्तब्धता को तोड़ते हुए कहा ।

    अंकल आप ऊपर वाली अटारी में झांक सकते हो...?

    मगर क्‍यो बेटा...?

    ‘ओह्हो अंकल... आप भी मम्‍मी की तरह कितने सवाल पूछते हैं... एक बार देखो तो सही।’ उसने बालकनी से कुर्सी लाकर बाथरूम की दीवार से सटाकर रख दी और अपने हाथ से मुझे उस पर चढ़कर अटारी में झांकने का इशारा करने लगा।

    ‘बेटा कुछ भी नहीं दिखायी दे रहा यहाँ।’ कुर्सी पर खड़े होकर मैंने अटारी में झांकते हुए कहा ।

    ‘अरे अंकल मोबाइल की टार्च से देखिए न।’ उसने बड़ी ही मासूमियत से मुझे गाइड करते हुए कहा।  

    ‘कुछ प्लेइंग कार्ड पड़े हैं यहाँ।’ मैंने टार्च की लाइट अटारी में मारते हुए बताया।

    ‘अरे अंकल नीचे उतारो न उन्‍हें’

    ‘यह लो... क्‍या करोगे इनका.. यह तो गंदे हो गए हैं।’  मैंने सारे कार्ड अटारी से उतार कर उसके आगे बढ़ाते हुए कहा।

    ‘छी... कितने गंदे हो गए हैं। मम्‍मी ने मना किया है गंदी चीजों को छूने के लिए। मैं न लूंगा। पेंटर ने रंग करते समय सारा रंग इन कार्ड पर बिखेर दिया।’

    ‘अच्‍छा ठीक है कल मैं नए ले आऊँगा तब तुम खेल लेना।’

    ‘ठीक है अंकल... अब मैं चलता हूँ नहीं तो मम्‍मी मुझे ढू़ढ़ते हुए यहाँ तक पहुँच जाएँगी।’

    ‘बेटा तुमने बिस्‍किट तो खाये ही नहीं!’

    ‘नहीं अंकल नहीं खा सकता।’

    ‘मगर क्यूँ?’  मैंने आश्‍चर्यपूर्वक पूछा ।

    ‘बताया तो था मम्मी ने कहा है।’ उसने मेनडोर खालते हुए कहा।

    ‘बाय बेटा’

    ‘बाय अंकल।’ दरवाजा खुला था और सीढ़ियों से नीचे उतरते कदमों की आवाज नेफ्थ्‍य में गूँज रही थी। मैं दरवाजे को बंद कर वापस लॉबी में लौट आया और टीवी का रिमोट तलाशने लगा। अम्मू के बातों की मिठास अब भी पूरे घर मैं घुली हुई थी।

    ट्रिंग... ट्रिंग… फिर से डोरबेल बजी। मुझे लगा शायद वहीं नटखट बच्‍चा वापस लौट कर आया होगा। अपने-आप कदम मेनडोर की ओर बढ़ चलें।  उससे मिलने के बाद उससे लगाव सा हो गया था।

    ‘अम्मू यहाँ आया था। मेरा लड़का... इतना बड़ा।’  महिला ने अपना हाथ नाभी तक हवा में उठाते हुए पूछा। मैंने अभी दरवाजा खोला ही था कि दहलीज पर खड़ी उस महिला ने अपना प्रश्‍न दाग दिया। तीसएक साल की उस महिला ने गुलाबी रंग की साड़ी पहनी हुए थी। पढ़ी लिखी... किसी सभ्य परिवार की लग रही थी। मैं समझ गया कि यह अम्मू कि मम्मी होगी।

    ‘जी....’ मेरे मुँह से बस यही शब्‍द निकल पाया।

    ‘जी मेरा मतलब मेरा बेटा अमित यहा आया था।’  अपने खुले केशुओं बांधते हुए अम्मू कि मम्मी ने फिर से कहा।   

    ‘जी आया तो था.... बस अभी दो मिनट पहले ही यहाँ से गया है।’  मैंने अम्मू कि मम्मी आश्‍वस्‍त करते हुए कहा।  

    ‘अरे अंकल मैं यहाँ  हूँ.... इधर... कहाँ जाऊॅँगा...।’  घर के भीतर की तरफ से अम्मू की आवाज आई।

    मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वह अपनी मस्ती में सोफे पर बैठा टांगों को घड़ी के पेंडुलम की तरह कभी दाएँ कभी बाएँ हिला रहा है। मैं चकित सा कुछ बोल पाने की स्तिथि में न था। मैं पुन: उस महिला मने अम्मू कि मम्मी की तरफ अपनी गर्दन घुमाता हूँ तो पाता हूँ दरवाजे पर कोई नहीं है। मैं अचंभित सा होकर मेनडोर को वापस बंद करता हूँ और सोफे की तरफ जाने के लिए घूमता हूँ तो पाता हूँ कि सोफे पर कोई नहीं है। काफी टेबल पर एक प्‍लेट में बिस्कुट पड़े हैं, मेरी चाय ठंडी हो चुकी है और चाय पर एक परत सी उभर आयी है। चाय के पास ही बच्‍चों के खेलने वाले मैले कुचले से प्‍लेइंग कार्ड पड़े हैं। 

     

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