• भूख है तो सब्र कर - साये में धूप

  • भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
    आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुदद्आ ।

    मौत ने तो धर दबोचा एक चीते कि तरह
    ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ ।

    गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही
    पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ ।

    क्या वज़ह है प्यास ज्यादा तेज़ लगती है यहाँ
    लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुँआ ।

    आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को
    आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला ।

    इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो
    जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुँआ ।

    दोस्त, अपने मुल्क कि किस्मत पे रंजीदा न हो
    उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ ।

    इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात
    अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ ।

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